यह चैत्यवंदन शत्रुंजय पर्वत की तलहटी (शुरुआत) में किया जाता है।
तृतीय चैत्य — तप का अभिवादन तृतीय चैत्य को नमन, तप-बल का अनंत स्वरूप। त्याग और संयम के पथ पर चलकर मिलती मुक्ति सुफल रूप॥ ॐ नमो तपोवनाय
रायण वृक्ष है और श्री आदिनाथ भगवान से अलंकृत है। यह वृक्ष अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस पवित्र वृक्ष के नीचे आदिनाथ परमात्मा ने पूर्व नवाणुं बार समोसरे किए और अनेकों बार समवसरण की रचना हुई।
शांति जिनेश्वर सोळमा, अचिर सुत वंदो;विश्वसेन कुल नभोमणि, भविजन सुख कंदो।मृग लांछन जिन ओखणुं, लाख वरस प्रमाण;हस्तिनापुर नगरी धणी, प्रभुजी गुण मणिखाण।चालीश धनुषनी देहड़ी, समचोरस संस्थान;वदन पद्म ज्युं चांदलो, दीठे परम कल्याण। palitana 5 chaityavandan in hindi full
आदिनाथ प्रभु ने इसी वृक्ष के नीचे ध्यान लगाया था। यह स्थान अत्यंत ऊर्जावान माना जाता है। स्तवन:
1. प्रथम चैत्यवंदन: जय तलेटी (Jay Taleti Chaityavandan)
श्री शत्रुंजय सिद्ध क्षेत्र, दीठे दुर्गति वारे;भाव धरीने जे चढे, तेने भवपार उतारे।अनंत सिद्धनो आहे ठाम, सकल तीर्थनो राय;पूर्व नवानुं ऋषभदेव, ज्यां ठाविया प्रभु पाय।सूरजकुंड सोहामणो, कावड़ यक्ष अभिराम;नाभिराया कुल मंडणो, जिनवर करूं प्रणाम। अचिर सुत वंदो
मुख्य टुंक के भीतर मुख्य गर्भगृह में विराजमान पालिताना के मूलनायक भगवान ऋषभदेव (आदीश्वर प्रभु) के सम्मुख यह अंतिम और पाँचवाँ चैत्यवंदन किया जाता है।
1. जय तलेटी चैत्यवंदन (First Chaityavandan of Jay Taleti)
पुंडरीक मंडन पाय प्रणमी जे, आदीश्वर जिणचंदाजी,नेम विणा त्रेवीश तीर्थंकर, गिरि चढिया आनंदीजी।आगम माहे पुंडरीक महिमा, भाख्यो ज्ञान दिणंदाजी,चैत्री पूनम दिन देवी चक्केसरी, सौभाग्य द्यो सुखंदाजी। विश्वसेन कुल नभोमणि
शांति जिनेश्वर सोलमा, अचिरा सुत वंदो,विश्वसेन कुल नभोमणि, भविजन सुख कंदो। (१)
पालीताणा में चैत्यवंदन की विधि एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसका पालन श्रद्धापूर्वक किया जाता है:
क्या आप इन चैत्यवंदनों का या इनके साथ गाए जाने वाले स्तवन (Stavans) की जानकारी चाहते हैं?
पालीताणा ५ चैत्यवंदन जैन धर्म के अनुयायियों के लिए एक पवित्र स्थल है, जो अपनी अद्वितीय वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। इस तीर्थ स्थल का महत्व इस प्रकार है:
इस वंदन के साथ यात्रा की पूर्णता होती है और भक्त मोक्ष प्राप्ति की कामना करते हैं。